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Thinking : चिंतन शक्ति के कारण ही मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ

माना जाता है। चिंतन में मनुष्य अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक जटिल

संज्ञानात्मक प्रक्रिया करता है। संसार की प्रगति में मनुष्य के द्वारा किए

गए चिंतन का महत्वपूर्ण योगदान है। चिंतन (Thinking) एक ऐसी

मानसिक प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति किसी नई परिस्थिति का सामना करने

अथवा किसी समस्या का समाधान करने में अपने पूर्व अनुभवों का

प्रयोग करता है। चिंतन की प्रक्रिया में संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, प्रत्यय

निर्माण और स्मृति आदि का समावेश होता है। चिंतन के द्वारा ही व्यक्ति

अपने समस्याओं का समाधान करता है। व्यक्ति अपने प्रयोजन को पूरा

करने के लिए चिंतन करता है। किसी भी प्रयोजन की पूर्ति के लिए

व्यक्ति को एक निश्चित योजना बनानी पड़ती है सोच – विचार कर कार्य

करने होते हैं। मार्ग में आने वाली बाधाओं का समाधान खोजना पड़ता

है, यह चिंतन के द्वारा ही सम्भव हो पाता है।

चिंतन प्रक्रिया (Process Of Thinking)

लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रयास करना – चिंतन में व्यक्ति अपने लक्ष्य को

प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता है। उसका प्रयास होता है कि

समस्या का समाधान हो जाए।

अपने अनुभवों का स्मरण करना – चिंतन में व्यक्ति अपने पुराने

अनुभवों को पुनः स्मरण करता है जिससे उनके आधार पर वह वर्तमान

समस्या का समाधान करने में समर्थ हो सके।

किसी लक्ष्य की ओर उन्मुख होना – व्यक्ति के सम्मुख जब कोई

समस्या उत्पन्न होती है तब वह उस समस्या का समाधान करने के लिए

चिंतन करता है। चिंतन का लक्ष्य समस्या को दूर करना होता है।

पूर्व अनुभवों को वर्तमान समस्या से संयोजित करना – जब व्यक्ति

अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर वर्तमान समस्या का समाधान खोजने

का प्रयास करता है तब उसके सम्मुख समस्या के अनेक संभावित

समाधान उपस्थित होने लगते हैं।

समाधान की सार्थकता देखना – जब चिंतनकर्ता के मस्तिष्क में

समस्या के सम्बंध में कई समाधान प्रस्तुत हो जाते हैं तो वह उनमें से

किसी एक समाधान का चयन करता है और उसे व्यवहारिक रूप देकर

समस्या के समाधान में उसकी सार्थकता को प्रमाणित करता है।

चिंतन के प्रकार (Kinds of Thinking)

प्रत्यक्षात्मक चिंतन (Perceptual Thinking) – यह सर्वाधिक

निम्न स्तर का चिंतन है जो प्रायः छोटे बच्चों तथा पशुओं में पाया जाता

है। इस प्रकार के चिंतन का मुख्य आधार संवेदना और प्रत्यक्षीकरण से

प्राप्त प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इस प्रकार के चिंतन में भाषा और संकेतों का

प्रयोग नहीं किया जाता है। यह चिंतन किसी प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित

घटना पर आधारित है। इस प्रकार के चिंतन में प्राणी अपने पूर्व अनुभवों

का उपयोग करता है।

कल्पनात्मक चिंतन (Imaginative Thinking) – कल्पनात्मक

चिंतन का आधार मानसिक प्रतिमाएँ (Image) होती है। इस प्रकार के

चिंतन में कोई वस्तु और परिस्थिति प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं होती

है। इसमें व्यक्ति उद्दीपक के सम्मुख न होने पर भी स्मृति के आधार पर

भविष्य के बारे में सोचता है। जैसे – माता – पिता बाजार जाते हैं, तब

बच्चे मन ही मन कल्पना करते हैं कि बाजार से लौटने पर वे उसके लिए

खाने को कुछ लाएंगे और साथ ही खिलौना भी लाएंगे।

प्रत्ययात्मक चिंतन (Conceptual Thinking) – यह चिंतन का

सर्वोच्च रूप है। इस प्रकार के चिंतन में पूर्व निर्मित प्रत्ययों के आधार पर

प्राणी चिंतन करता है। इस प्रकार के चिंतन में भाषा और संकेतों का

प्रयोग किया जाता है। प्रत्ययात्मक चिंतन एक अत्यंत जटिल मानसिक

प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति पुराने अनुभवों के आधार पर अपनी वर्तमान

समस्या का सूक्ष्मतम विश्लेषण करता है और उसके संबंध में किसी

निष्कर्ष पर पहुंचता है।

चिंतन का शैक्षिक महत्व (Educational Importance of

Thinking) – सफल जीवन के लिए चिंतन अत्यंत आवश्यक है। यह

व्यक्ति की वह मानसिक क्रिया है जो उसे अन्य व्यक्तियों से श्रेष्ठ बनाती

है। शैक्षिक और व्यवसायिक क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने में व्यक्ति की

चिंतन शक्ति का महत्वपूर्ण योगदान रहता है।

By Anjali Singh Rajput

Senior Executive Editor

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