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15/02/21 आज मानव जीवन में जल के द्वारा संक्रामक रोगों का प्रसार दिन प्रतिदिन बढता जा रहा है। जिसके रोकथाम के लिए चिकित्सकों द्वारा शुद्ध जल का उपयोग करने की सलाह दी जाती है।

जल के शोधन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रसायनशास़्त्र विभाग के आचार्य प्रो0 बलिराम ने बताया कि आर.ओ. द्वारा जल को शुद्ध करने हेतु नार्मल ध्रुवीय वर्णलेखन विधि एवं रिवर्स ध्रुवीय वर्णलेखन विधियों का प्रयोग किया जा रहा है। उक्त बातें दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय के रसायनशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान में प्रो0 बलिराम ने कही।

एन.पी.सी. और आर.पी.सी. का लिक्विड-लिक्विड क्रोमैटोग्राफी में उपयोगिता के बारे में भी बताया। उक्त व्याखान में महाविद्यालय के प्राणिविज्ञान विभाग की प्रभारी डाॅ0 अनिता कुमारी, भौतिकशास्त्र विभाग से डाॅ0 नितेश शुक्ला, वाणिज्य संकाय से डाॅ0 अमरनाथ तिवारी, एवं रसायनशास्त्र विभाग से डाॅ0 आनन्द गुप्ता, डाॅ0 राजेश सिंह एंव अन्य कर्मचारीगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन रसायनशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित विशिष्ट व्याख्यान की प्रभारी डाॅ0 (श्रीमती) शशिप्रभा सिंह ने किया।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में एम.एससी रसायनशास्त्र कि छात्रा अन्जू पाठक ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की एवं मानवी सिंह ने पुष्पगुच्छ देकर अतिथि महोदय का स्वागत किया। कार्यक्रम के अन्त में रसायनशास्त्र विभाग के डाॅ0 मनीष श्रीवास्तव ने मुख्य अतिथि एवं समस्त प्रतिभागियों के प्रति आभार ज्ञापन किया।

दिग्विजयनाथ स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोरखपुर के गणित विभाग के तत्वावधान में एक व्याख्यान का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य वक्ता प्रो. सुधीर श्रीवास्तव, गणित विभाग, दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने गणित की व्यवहारिक जीवन में उपयोगिता विषय पर एक अतिथि व्याख्यान दिया। प्रो. सुधीर श्रीवास्तव ने कहा कि गणित वह मार्ग है जिससे तर्क की आदत स्थापित होती है।

प्राचीन काल के राजनीतिज्ञ, गणित के समर्थक थे। उनके अनुसार देश की उन्नति तथा वृद्धि गणित पर निर्भर करती है। गणित की व्यवहारिक जीवन में उपयोगिता पर चर्चा करते हुए कहा कि गणित वह भाषा है जिसमें ईश्वर ने सारा संसार रचा है। उन्होंने गणित में फंक्शन के द्वारा कक्षा को सुचारू संचालन के लिये कांस्टेंट मैपिंग को आवश्यक बताया। गणित में वन-वन और वन टू को व्यावाहारिक जीवन से जोड़ते हुए सबका साथ सबका विकास को गणितीय भाषा में समझाया। अधिक कोण व न्यूनकोण को छात्रों के दूरदर्शिता को जोड़ते हुए बौद्धिक धरातल को समृद्ध करना बताया। इसके साथ ही प्राचीन काल में गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरित मानस में चैपाई तथा दोहों में गणित के अनुप्रयोग को भी स्पष्ट किया।

ग्रुप विषय पर चर्चा करते हुए, ग्रुप में आइडेंटिटी को ईश्वर का स्वरूप बताया और कहा कि जैसे सूर्य की किरणे सबको समान रूप से मिलती हैं वैसे ही ग्रुप में आइडेंटिटी सभी तत्वों के साथ समान व्यवहार करता है। इसी क्रम में स्पेस से शुरूआत करते हुए गणित के विभिन्न शाखाओं पर भी चर्चा की।

इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने विद्यार्थियों को जीवन में गणित की व्यवहारिक उपयोगिता के महत्व को बताते हुए समय के परिपालन पर जोर दिया। उक्त कार्यक्रम में डॉ सूरज शुक्ल, डॉ कीर्ति कुमार जायसवाल, श्री रामपाल मौर्य के साथ ही बी.एस.सी एवं एम.एस.सी के छात्र/छात्राओं भी उपस्थित रहें।

इसी क्रम में शिक्षाशास्त्र विभाग में ’बुद्धि की संकल्पना एवं मापन’ विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य वक्ता डाॅ. विनोद कुमार श्रीवास्तव, अध्यक्ष शिक्षाशास्त्र विभाग डी.ए.वी. पी.जी.कालेज गोरखपुर रहें।

प्रो. श्रीवास्तव ने कहा कि बुद्धि ही मानव को पशु से अलग करती है। बुद्धि नई परिस्थिति में समायोजन, सीखने की योग्यता एवम् अमूर्त चीतंन की योग्यता है। वास्तव में वंशानुक्रम एवं वातावरण ही बुद्धि को प्रभावित करने वाले ही कारक है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने वंशानुक्रम एवं वातावरण के सापेक्षिक महत्व पर शोध किया है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ. शैलेन्द्र प्रताप सिंह ने किया तथा आभार ज्ञापन डाॅ रूक्मिणी चैधरी ने किया। उक्त अवसर पर विभाग के शिक्षक श्री श्याम सिंह, डाॅ. सजीत कुमार सिंह, डाॅ. सरिता सिंह एवं डाॅ. मुरली मनोहर तिवारी उपस्थित रहें। डाॅ.(शैलेन्द्र प्रताप सिंह )

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