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जिस परिस्थिति को आपका मन स्वीकार ले वहीं असली सुख हैं, इस

दुनिया में सुख और दुःख दोनों एक साथ चलने वाली प्रक्रिया है लेकिन

स्वरूप अलग – अलग होता है, आप सभी लोग को अक्सर ऐसा लगता

होगा कि सबसे बड़ा दुःख भगवान आपको ही दिए हैं, किन्तु उसके कुछ

क्षण बाद आपको ऐसा देखने को अवश्य मिलता है कि आपसे बड़ा भी

कोई दुखी हैं,

इस संसार में सभी जीव का जीवन इस प्रकार से है कि वह हर क्षण

बदलता रहता है, किसी क्षण वह हँसता है तो ठीक दूसरे क्षण वह रोता

है, एक पूरे दिन में जीव लगातार एक किसी भी गति में नहीं रह सकता है

ना ही लगातार रो सकता है ना ही लगातार उदास रह सकता है ना ही

लगातार खुश रह सकता है,

आप सभी लोग ऐसे बहुत सारे लोगों को देखे और जानते होंगे जो लोग

सन्तान के सुख के लिए रोते बिलखते दिखाई देते हैं सन्तान के सुख के

लिए लोग बहुत सारे उपाय और जत्न करते हैं, वहीं आप सभी ये भी

देखे होंगे कि लोग अपने संतान से परेशान हैं वह इस बात पर अफसोस

जताते हैं कि आखिर क्यों हमने इसे जन्म दिया…

इस विश्व में ऐसे बहुत लोग आपको मिल जाएगे जो बुढ़ापे में अपने माँ

बाप को मारते हैं और घर से वृद्धा आश्रम जाने पर मजबूर कर देते हैं या

भेज देते हैं, जो माँ बाप इतना कष्ट के साथ जिस बच्चे को जन्म दिया

पाल पोष कर बड़ा बनाया वहीं संतान उसको छोड़ देता है।

आप खुद इसका निर्णय लीजिए कि क्या सही है क्या गलत है, मनुष्य

ऐसा प्राणी है जो हर परिस्थिति को देखता है और सामना करता है,

उसके बाद भी कई प्रकार की गलतिया करता है,

किसी भी काम को देखा जाए तो वह गलत भी है और सही भी है जो

काम समाज के हित के लिए सही है वह काम सही है और जो काम

समाज के लिए गलत है वह गलत है.

यदि सुख पैसा अर्जित करने में है, तो क्या जिसके पास पैसा है वह सुखी

हैं? क्या उसके यहाँ कोई दुःख नहीं है?

ऐसा बिल्कुल भी नहीं है जिसके पास जितना अधिक धन और ऐश्वर्य है

वह उतना ही दुःखी है, लेकिन उसका दुःख आपके दुःख से अलग है

उसका दुःख उसके महत्वकांक्षा के अनुरूप है आपका दुःख आपके

महत्वकांक्षा के अनुरूप हैं, जिसकी जितनी बड़ी अभिलाषा है उसका

दुःख उतना ही बड़ा है.

ये कहना की जिसके पास धन और ऐश्वर्य है वह उतना ही दुःखी है,

जिसके वज़ह से धन अर्जित करना सही नहीं है तो यह कहना बिल्कुल

गलत है, दुःख का कारण आपकी मन की परिस्थिति है,

जिस परिस्थिति को आपका मन स्वीकार ले वहीं असली सूख है सभी

सुख और दुःख का कारण मन ही है जिस चीज़ को आपका मन स्वीकार

ले वहीं सूख है जिसको न स्वीकार करे वह दुःख हैं,

असली विजय मन की ही होती है जिस पर सभी विजय नहीं पाते हैं, जो

अपने मन पर विजय प्राप्त कर लिया वह सबसे बड़ा सुखी है, जो अपने

मन पर विजय नहीं पाया उसको हमेशा दुख व्याप्ता रहेगा।

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